18 साल बाद मिला इंसाफ: पट्टीशाह हत्याकांड में 14 दोषियों को उम्रकैद, 210 सुनवाइयों के बाद आया फैसला
*डिस्ट्रिक हेड राहुल द्विवेदी*
फतेहपुर। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के हथगाम थाना क्षेत्र स्थित पट्टीशाह गांव में वर्ष 2008 में हुए चर्चित दोहरे हत्याकांड में अदालत ने लगभग 18 साल बाद ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 14 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। लंबे समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया, 210 से अधिक सुनवाइयों और 13 गवाहों की अडिग गवाही के बाद सत्र न्यायाधीश सुधीर कुमार की अदालत ने दोषियों को सजा सुनाते हुए प्रत्येक पर 38-38 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है।
यह मामला सिर्फ एक हत्या या आपराधिक घटना का नहीं था, बल्कि गांव में वर्चस्व की लड़ाई, पुरानी रंजिश और खूनी संघर्ष की कहानी थी, जिसने वर्षों तक पूरे क्षेत्र को प्रभावित किया। अदालत के इस फैसले को दोनों पक्षों के बीच चली लंबे समय की हिंसक दुश्मनी के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है।
मातमी जुलूस में हुई थी ताबड़तोड़ फायरिंग
अभियोजन पक्ष के अनुसार 7 दिसंबर 2008 को पट्टीशाह गांव के तत्कालीन प्रधान एवं बसपा नेता मजहर हैदर नकवी उर्फ मज्जू मियां अपने बेटे रियाज हैदर नकवी और अंगरक्षक शमशाद के साथ बकरीद के अवसर पर निकाले गए मातमी जुलूस में शामिल होने गए थे। जुलूस जब गांव में दूसरे पक्ष के साबिर के दरवाजे के पास पहुंचा तो वहां पहले से घात लगाए बैठे लोगों ने हमला बोल दिया।
आरोपियों ने पहले मारपीट की और फिर ताबड़तोड़ गोलियां चलानी शुरू कर दीं। गोली लगने से मज्जू मियां के बेटे रियाज हैदर नकवी की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि अंगरक्षक शमशाद गंभीर रूप से घायल हो गए। इलाज के दौरान शमशाद ने भी दम तोड़ दिया। हमले में मज्जू मियां भी गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में पैरालाइज हो गए।
स्वास्थ्य कारणों से गवाही नहीं दे सके मज्जू मियां
गोली लगने के बाद मज्जू मियां की हालत लगातार खराब होती गई। वह अपने ही मुकदमे में अदालत के सामने गवाही नहीं दे सके। घटना के बाद उन्होंने गांव छोड़ दिया और लंबे समय तक इलाज कराते रहे। वर्ष 2012 में उनका निधन हो गया। हालांकि अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और अन्य परिस्थितिजन्य प्रमाणों को पर्याप्त मानते हुए सुनवाई जारी रखी।
13 गवाहों ने नहीं बदला बयान
मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी गवाहों की गवाही रही। इस मामले में कुल 13 गवाहों ने अदालत में बयान दर्ज कराए। विशेष बात यह रही कि वर्षों तक चली सुनवाई के दौरान कोई भी गवाह अपने बयान से नहीं मुकरा। अभियोजन पक्ष ने अदालत में चिकित्सीय रिपोर्ट, पुलिस जांच, घटनास्थल से जुटाए गए साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान पेश किए।
अदालत ने माना कि प्रस्तुत साक्ष्य और गवाहों की गवाही घटना को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं। इसी आधार पर सभी 14 आरोपियों को दोषी करार दिया गया।
नफीस हत्याकांड से जुड़ा था मामला
पट्टीशाह हत्याकांड के बाद दोनों पक्षों के बीच दुश्मनी और बढ़ गई। इसका परिणाम वर्ष 2009 में नफीस हत्याकांड के रूप में सामने आया। 24 नवंबर 2009 को शरीफ सेठ अपने भाई नफीस के साथ बाइक से घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में हमलावरों ने उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। इस हमले में नफीस की मौत हो गई थी।
नफीस हत्याकांड में इसी वर्ष फरवरी माह में मज्जू मियां पक्ष के 12 लोगों को दोषी ठहराया गया था। उल्लेखनीय है कि उस मुकदमे में गवाही देने वाले दो चश्मदीद गवाह—मोबीन और असगर—की गवाही वर्तमान मामले में भी महत्वपूर्ण साबित हुई। हालांकि दोनों स्वयं नफीस हत्याकांड में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में बंद हैं।
210 से अधिक तारीखों के बाद आया फैसला
करीब 18 वर्षों तक चले इस मुकदमे में 210 से अधिक तारीखें लगीं। इस दौरान कई आरोपी और संबंधित लोग दुनिया छोड़ चुके हैं, जबकि कई वर्षों तक मुकदमे की सुनवाई अलग-अलग चरणों में चलती रही। अदालत ने घटनाओं के क्रम, पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्र, चिकित्सीय रिपोर्ट और गवाहों के बयानों का विस्तृत अध्ययन करने के बाद फैसला सुनाया।
इन दोषियों को मिली उम्रकैद
अदालत ने शरीफ सेठ, रईस, शफीक, मोईन उर्फ मुर्रा, रईश, सगीर, निहालउद्दीन उर्फ नेहाल, इसराइल, अशोक, साबिर अली, सादिक अली, वाजिद अली, संजय शुक्ला और सुरेश उर्फ मुन्नू सिंह को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। सभी दोषियों पर 38-38 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
करीब दो दशक तक चले इस चर्चित मुकदमे में आए फैसले को न्याय व्यवस्था की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। अदालत के निर्णय ने यह संदेश दिया है कि अपराध कितना भी पुराना क्यों न हो, यदि साक्ष्य और गवाह मजबूती से खड़े रहें तो कानून के हाथ आखिरकार दोषियों तक पहुंच ही जाते हैं।




