बीमा क्षेत्र में100 परसेंट FDI ,सरकार का आत्मघाती कदम
FDI यानि Foreign Direct Investment बीमा क्षेत्र में 100% एफडीआई का नियम पास कर सरकार ने बीमा क्षेत्र को विदेशी बीमा कंपनियो को पूर्णतया सौंपने और देश की सरकारी कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम को प्रतिस्पर्धा के नाम पर कमजोर एवं समाप्त करने केअपने मंसूबे पर मोहर लगाने का काम कर दिया है।
देश के आमों आवाम को शायद इस नए नियम से होने वाले दुष्परिणाम का भान या ज्ञान ना हो परंतु जागरूक और संवेदनशील आवाम इसका पुरजोर विरोध कर रही है। समय की आवश्यकता है कि आमजन भी भविष्य में होने वाले इसके दुष्परिणामों से अवगत हो। इसको विस्तार से समझने के लिए बीमा, इसका इतिहास ,भारतीय जीवन बीमा निगम का गठन, उसकी प्रगति तथा बीमा का समाज में महत्व को जानना जरूरी होगा।
कहते हैं कि इतिहास इसीलिए पढ़ाया जाता है कि हम इतिहास से सीखे पर देखा गया है कि इतिहास खुद को दोहराता है अतः स्पष्ट होता है कि हमने इतिहास से यही सीखा की इतिहास से हमने कुछ नहीं सीखा।
असल में सन 1956 से पूर्व बीमा उद्योग में प्राइवेट कंपनियों का बोलबाला था लगभग 245 के आसपास जीवन बीमा में प्राइवेट कंपनियां काम कर रही थीं। परंतु बीमा को व्यवसाय समझ कर लाभ कमाने के उद्देश्य से काम करने वाली कंपनियों की कार्य प्रणाली में भ्रष्टाचार और विभिन्न प्रकार की विसंगतियां देखने को मिली परिणाम स्वरुप आमजन का बीमा जैसी इकाई से विश्वास उठने लगा और यह देखकर उस समय की सरकार ने इन 245 कंपनियों को मर्ज करके बीमा क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण किया और इसके साथ ही सितंबर 1956 में भारतीय जीवन बीमा निगम अस्तित्व में आया । सितंबर 1956 से लेकर 1999 तक जीवन बीमा क्षेत्र में भारतीय जीवन बीमा निगम का एकाधिकार रहा। परंतु 1999 आई हुई उस समय की सरकार ने आईआरडीए (बीमा नियामक आयोग) का गठन करके एक बार फिर से प्राइवेट कंपनियों और विदेशी कंपनियों को इस क्षेत्र में कार्य करने की अनुमति प्रदान कर दी शुरुआत में विदेशी कंपनियों के लिए 26% पूंजी लगाने का ही प्रावधान था परंतु समय के साथ-साथ समकालीन सरकारों ने 26% से 49%, 49% से 74% और अब 74% से 100% कर दिया । साथ ही पूंजी निवेश की सीमा भी कम कर दी। अर्थात अब कोई भी विदेशी कंपनी कम पूंजी के साथ स्वतंत्र रूप से भारत में बीमा क्षेत्र में कार्य कर सकती है उसे किसी भी स्वदेशी बीमा कंपनी के साथ टाई अप करने की भी जरूरत नहीं है। इतिहास बताता है कि जब-जब प्राइवेट कंपनी बीमा क्षेत्र में लाभ कमाने के उद्देश्य से व्यापार करते हैं तो उसमें विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार, विसंगतियां एवं विकार देखने को मिलते हैं और नुकसान आम आदमी का होता है और कहीं ना कहीं बीमा जैसी इकाई से एक बार फिर से विश्वास उठने की संभावना प्रबल हो जाती है।
समझने की जरूरत है कि बीमा व्यवसाय नहीं सामाजिक सुरक्षा है। सामाजिक सुरक्षा के इस महान आंदोलन में लाभार्थी कोई धन्ना सेठ या कंपनी का मालिक नहीं बल्कि बीमित व्यक्ति होना चाहिए ।
बीमा को पूरी तरीके से सामाजिक सुरक्षा मानकर भारतीय जीवन बीमा निगम ने 1956 से लेकर 2025 तक नए-नए कीर्तिमान गढ़ें 5 करोड़ की सामान्य पूंजी से शुरू कर आज भारतीय जीवन बीमा निगम का परसंपत्ति लगभग 42 लाख करोड़ और इसका लाइफ फंड तकरीबन 52 लाख करोड़ है।
लगभग 125 000 समर्पित कर्मचारी एवं अधिकारियों तथा पूर्ण ईमानदारी एवं निष्ठा से कार्यरत 14 लाख एजेंट्स के अनवरत प्रयासों से आज लगभग 42 करोड़ पॉलिसी धारकों को बीमा का कवच उपलब्ध कराया जा चुका है।
इतना सब इसलिए हो पाया क्योंकि भारतीय जीवन बीमा निगम सरकारी इकाई होने की वजह से जितनी भी आमदनी होती है मैनेजमेंट खर्चो को निकालकर बाकी सारा पैसा बोनस के रूप में पॉलिसी धारकों के अकाउंट में डाल देती है। सही मायने में भारतीय जीवन बीमा निगम के मालिक आम पॉलिसी धारक हैं कोई पूंजी पति नहीं। लेकिन जिस तरह से सन 1999 में आईआरडीए (बीमा नियामक आयोग) का गठन करके प्राइवेट और विदेशी कंपनियों को बीमा क्षेत्र में व्यवसाय करने की अनुमति प्रदान की उससे कहीं ना कहीं सामाजिक सुरक्षा का यह आंदोलन कमजोर पड़ रहा है। इन विदेशी कंपनियों के द्वारा भ्रामक प्रचार और गला काट प्रतिस्पर्धा की वजह से आम विमित व्यक्ति के हितों की रक्षा करना मुश्किल हो रहा है। सरकारी दलील की प्राइवेट एवं विदेशी कंपनियों के बीमा क्षेत्र में उतरने से सेवा की गुणवत्ता बढ़ेगी और ज्यादा से ज्यादा लोग बीमा की परिधि में आएंगे। पर वास्तविकता इसके उलट है कोई भी विदेशी कंपनी दूरस्थ इलाकों में अपनी ब्रांच नहीं खोलती और समाज के क्रीमी लेयर को ही अपना टारगेट कस्टमर मानती है। और उनके लिए इस क्षेत्र में लाभ कमाना ही मूल उद्देश्य है ना की सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना।
भारतीय जीवन बीमा निगम की अपनी मर्यादा है कि वह प्रतिस्पर्धा में पड़कर भ्रामक प्रचार नहीं कर सकती और आम बीमा धारकों के हितों की उपेक्षा नहीं कर सकती । लेकिन विदेशी कंपनिया या पूंजी पति वर्ग इस मर्यादा को नहीं मानते है व्यवसाय में बने रहने के लिए और अधिक से अधिक लाभ कमाने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकते हैं ऐसे में भारतीय जीवन बीमा निगम को बचाए रखने में और उसकी सेवा को निर्बाध चलाए रखने में संस्था के कर्मचारी और उनकी ट्रेड यूनियंस संपूर्ण शक्ति एवं समग्रता से तत्पर है। पूंजीवादी सोच की सरकारे एवं व्यवसायियों ने इसके पहले भी बीमा क्षेत्र मे अपनी मोनोपोली बनाने का प्रयास किया परंतु यहां के कर्मचारी और उनकी ट्रेड यूनियंस ने अपने पूर्ण समर्पण निष्ठा ईमानदारी और संघर्ष से उनके मंसूबे कामयाब नहीं होने दिए। आज भी 100% FDI का पुरजोर विरोध करके आम जन सामान्य को जागरुक करते हुए न सिर्फ कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना अपितु सामाजिक सुरक्षा और मानवाधिकार के इस महान आंदोलन को बचाए रखने में संघर्ष का रास्ता अपनाया है ।
अतः आवश्यक हो जाता है कि जन सामान्य भी इस मर्म को समझें और वह देखे कि कैसे उनके मानवाधिकार और सामाजिक सुरक्षा के हितों को तार-तार करने के लिए सरकार और पूंजीपति वर्ग एकजुट हो रहा है
अंत में कहना चाहूंगा की मृत्यु शाश्वत है परंतु अनिश्चित इस अनिश्चिता से परिवार के कमाने वाले व्यक्ती की मृत्यु से परिवार में होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई कुछ हद तक बीमा ही कर पाता है बीमा आम आदमी के स्वाभिमान और उसके सामाजिक स्थिति को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अतः बीमा को व्यवसाय नहीं सामाजिक सुरक्षा ही रहने दे क्योंकि जिस देश और समाज में सामाजिक सुरक्षा मजबूत होती है वही देश और वहां के निवासी विकसित एवं गौरवशाली माने जाते हैं।




