‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामला: बांदा दुष्कर्म कांड में दोषी को फांसी, शासकीय अधिवक्ताओं की रणनीति से मिला ऐतिहासिक इंसाफ
डिस्ट्रिक हेड | राहुल द्विवेदी
बांदा। छह वर्षीय मासूम से दुष्कर्म के जघन्य मामले में अदालत द्वारा दोषी अमित रैकवार को मृत्युदंड की सजा सुनाया जाना न केवल पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने वाला फैसला है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था की दृढ़ता और संवेदनशीलता का भी प्रतीक है। इस ऐतिहासिक निर्णय के पीछे शासकीय अधिवक्ताओं की अथक मेहनत, मजबूत पैरवी और सटीक कानूनी रणनीति की अहम भूमिका रही।
पॉक्सो मामलों के शासकीय अधिवक्ता कमल सिंह गौतम ने इस प्रकरण को महज एक केस नहीं, बल्कि हर उस पिता के दर्द से जोड़कर देखा जिसकी एक बेटी है। उन्होंने बताया कि अक्टूबर में केस सौंपे जाने के बाद से ही उन्होंने दिन-रात इस पर काम किया। गहन अध्ययन में सामने आया कि पुलिस की चार्जशीट में दो गंभीर धाराएं शामिल नहीं की गई थीं।
इनमें पीड़िता का हाथ तोड़ने से संबंधित धारा 117(2) और पहचान छुपाने के उद्देश्य से जीभ काटने की धारा 118(2) शामिल थीं। अधिवक्ता कमल सिंह गौतम ने विवेचक के साथ समन्वय कर इन खामियों को दूर कराया और अतिरिक्त चार्जशीट दाखिल करवाई, जिससे आरोपी को बचने का कोई मौका न मिले। इसी सुदृढ़ आधार पर अदालत में मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में स्थापित किया गया और मृत्युदंड की सजा सुनिश्चित हो सकी।
ट्रायल के दौरान आईं कई चुनौतियां
प्रकरण की मॉनिटरिंग कर रहे शासकीय अधिवक्ता विजय बहादुर सिंह परिहार ने बताया कि मामला संज्ञान में आते ही वे भीतर तक हिल गए थे। ट्रायल के दौरान पीड़िता की मानसिक स्थिति ठीक न होना और बोल पाने में असमर्थता जैसी कई व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आईं, लेकिन मजबूत साक्ष्यों और गवाहों की प्रभावी प्रस्तुति से आरोप सिद्ध किए गए।
उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले समाज में कानून के प्रति विश्वास को मजबूत करते हैं और अपराधियों को स्पष्ट संदेश देते हैं कि जघन्य अपराधों का परिणाम अत्यंत कठोर होता है।
अब नाम नहीं, सिर्फ कैदी नंबर
मृत्युदंड की सजा के बाद अमित रैकवार की पहचान पूरी तरह बदल गई है। अब वह जेल में कैदी नंबर-2621702 के रूप में जाना जाएगा। जिला जेल लाए जाने के बाद उसके व्यवहार में स्पष्ट बदलाव देखा गया। जेल सूत्रों के अनुसार वह गुमसुम रहा और उसने रात का खाना भी नहीं खाया।
जेल अधीक्षक अनिल कुमार ने बताया कि मृत्युदंड पाए कैदियों की मानसिक स्थिति बेहद संवेदनशील होती है। इसी कारण अमित को अन्य बंदियों से अलग रखते हुए बैरक नंबर-9ए में स्थानांतरित किया गया है, जो विशेष निगरानी वाले कैदियों के लिए आरक्षित है। जेल डॉक्टरों की टीम उसकी मानसिक और शारीरिक स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है।
पीड़ित परिवार को अब भी सरकारी सहायता का इंतजार
पीड़ित मासूम के माता-पिता ने बताया कि उनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। बच्ची का इलाज कानपुर में चल रहा है और वे फिलहाल रिश्तेदारों के यहां रह रहे हैं। पिता ने बताया कि उन्हें डेमो चेक तो मिला है, लेकिन वास्तविक धनराशि अभी तक प्राप्त नहीं हुई।
हालांकि अदालत ने जिलाधिकारी के माध्यम से प्रमुख सचिव को निर्देश दिए हैं कि बच्ची के इलाज का पूरा खर्च सरकार वहन करे। इसके बावजूद पीड़ित परिवार ने आरोपी के पिता द्वारा लगातार धमकी दिए जाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि गांव में रहना अब असुरक्षित हो गया है और वे सरकार से नौकरी व स्थायी सहायता की मांग कर रहे हैं।




