विशेष खुलासा: कानपुर में ‘मौत का सर्टिफिकेट’ बांट रहा दलालों का सिंडिकेट; बिना जांच के जारी हो रहे CNG फिटनेस प्रमाण-पत्र
*कानपुर | विशेष इन्वेस्टिगेशन: राहुल द्विवेदी (डिस्ट्रिक्ट हेड, टाइम्स एंड स्पेस)*
कानपुर। महानगर में जनसुरक्षा के साथ खिलवाड़ का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जो किसी भी दिन बड़े हादसे का सबब बन सकता है। फजलगंज थाना क्षेत्र में सीएनजी वाहनों के सिलेंडरों की जांच के नाम पर ‘गो ऑन ग्रीन’ (Go On Green) सेंटर के माध्यम से एक बड़ा फर्जीवाड़ा फल-फूल रहा है। आरोप है कि आरटीओ के रसूखदार दलालों और सेंटर संचालकों की मिलीभगत से बिना गाड़ी देखे ही सीएनजी फिटनेस सर्टिफिकेट बेचे जा रहे हैं।
*दलालों का नेटवर्क और ‘रेट कार्ड’*
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे काले कारोबार का ताना-बाना आरटीओ के चर्चित दलाल मनोज सिंधी और उनके पुत्र मोहक लाल चंदानी (गो ऑन ग्रीन के मालिक) के इर्द-गिर्द बुना गया है। इस सिंडिकेट में शैलेंद्र पांडेय नामक व्यक्ति मुख्य कड़ी के रूप में काम कर रहा है।
काम करने का तरीका: वाहन को टेस्टिंग सेंटर लाने की कोई जरूरत नहीं। दलाल सिर्फ व्हाट्सएप पर गाड़ी की फोटो मंगवाते हैं।
वसूली का खेल: बिना किसी भौतिक परीक्षण (Physical Verification) के, फोटो के आधार पर ही सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाता है। इसके बदले ग्राहकों से ₹1500 से ₹1800 तक की मोटी रकम वसूली जा रही है।
*जनसुरक्षा से बड़ा खिलवाड़ क्यों?*
सीएनजी सिलेंडर की हाइड्रो-टेस्टिंग एक अनिवार्य प्रक्रिया है, जिससे यह पता चलता है कि सिलेंडर गैस के दबाव को सहने की स्थिति में है या नहीं।
हादसों को दावत: कानपुर में पहले भी सीएनजी सिलेंडर फटने से कई दर्दनाक मौतें हो चुकी हैं।
नियमों की धज्जियां: हाइड्रो-टेस्टिंग के मानकों को ताक पर रखकर केवल कागजों पर ‘ऑल ओके’ लिख देना सीधे तौर पर आपराधिक कृत्य है।
सड़क पर खतरा: ऐसी गाड़ियां सड़कों पर बम की तरह दौड़ रही हैं, जो न केवल चालक बल्कि आसपास के लोगों के लिए भी जानलेवा हैं।
*फजलगंज पुलिस और आरटीओ मौन क्यों?*
हैरानी की बात यह है कि फजलगंज जैसे व्यस्त थाना क्षेत्र में यह खेल सरेआम चल रहा है, लेकिन परिवहन विभाग (RTO) और स्थानीय पुलिस ने अब तक इस पर कोई शिकंजा नहीं कसा है। रसूखदार दलालों के सिंडिकेट के आगे प्रशासन की चुप्पी कई बड़े सवाल खड़े करती है:
क्या विभाग को इस अवैध कारोबार की जानकारी नहीं है?
क्या बड़े हादसों का इंतजार कर रहा है प्रशासन?
बिना सरकारी मिलीभगत के इतना बड़ा सिंडिकेट कैसे संचालित हो रहा है?
*निष्कर्ष*: ‘टाइम्स एंड स्पेस’ की इस रिपोर्ट के बाद अब गेंद प्रशासन के पाले में है। क्या फजलगंज पुलिस और आरटीओ इस ‘डेथ ट्रैफिकिंग’ को रोकेंगे या फिर किसी बड़े धमाके के बाद ही विभाग की नींद खुलेगी?




