गंगनहर का हाहाकार: आक्रोश …
ले गया सब कुछ मगर धड़कनें छोड़ गया….
शायद लौट आने का कोई वहम छोड़ गया…
नोच डाला उस कली को…
जिसने अभी बस महकना सीखा था…
उन पिशाचों के कुत्सित चेहरों पर..
हैवानियत का तांडव तीखा था।
कांप उठी थी धरा उस क्षण..
और अंबर भी पूरा दहल उठा था
जीते-जी एक जीवंत स्वप्न को..
उन दरिंदों ने शव में बदल दिया …
तार-तार हुआ जब आंचल उसका.. सृष्टि का हर कण थर्राया था..
देख वह वीभत्स, भयावह मंज़र, विधाता भी अपनी रचना पर पछताया था…
यह मात्र एक काया पर आघात नहीं..
यह तो संपूर्ण मानवता का जनाज़ा है..
इस नपुंसक व्यवस्था के माथे पर लगा.. यह कलंक अभी तक ताज़ा है।
कब तक इस घिनौनी मानसिकता का, समाज में यह वीभत्स बाज़ार सजेगा?
क्या इस खंडित, सोए हुए लोकतंत्र में, कभी बेटियों का स्वाभिमान बचेगा?
अब सब्र का बांध टूट चुका है..
पानी भी सिर से ऊपर जा चुका है..
न्याय की धधकती चौखट से अब, केवल अंगारों का बरसना ही बाकी है..
अब याचना का समय शेष नहीं, अधर्म के विरुद्ध अब भीषण रण बाकी है..
उन नरपिशाचों को सरेआम सूली पर चढ़ाना,
अब एकमात्र प्रण हम सबका है..
ले गया सब कुछ मगर धड़कनें छोड़ गया….
शायद लौट आने का कोई वहम छोड़ गया…
Stuti Bhushan




