*“न्यू कानपुर सिटी” पर फिर भड़का किसान गुस्सा,केडीए पर गरीब किसानों की जमीन हड़पने का आरोप, पुलिस छावनी में तब्दील हुआ इलाका*
मंजूर अली की रिपोर्ट
*आंधी-तूफान के बीच खेतों पर डटे रहे किसान, बोले “यह जमीन नहीं, हमारे अस्तित्व की लड़ाई”*
कानपुर के बिठूर क्षेत्र में मंगलवार को उस समय हालात तनावपूर्ण हो गए, जब कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) की “न्यू कानपुर सिटी” परियोजना के तहत किसानों की जमीन पर कब्जे की कार्रवाई की आशंका को लेकर सैकड़ों किसान खेतों पर उतर आए। भारी पुलिस बल, पीएसी और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील नजर आया। किसानों ने केडीए अधिकारियों का घेराव कर जमीन अधिग्रहण से जुड़े कानूनी दस्तावेज और मुआवजे का हिसाब मांगा, लेकिन मौके पर मौजूद अधिकारी किसानों के सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं दे सके। इससे किसानों में भारी आक्रोश फैल गया। महिलाओं समेत बड़ी संख्या में किसान खेतों पर डटे रहे और चेतावनी दी कि “जमीन पर जबरन कब्जा किसी कीमत पर नहीं होने दिया जाएगा।”पीड़ित किसानों का आरोप है कि वर्ष 1996 में धारा 17 लगाकर उनकी जमीन अधिग्रहित दिखा दी गई, जबकि न तो उन्हें उचित मुआवजा मिला और न ही कोई वैधानिक सूचना दी गई। किसानों का कहना है कि 2007 में राजस्व अभिलेखों में उनकी जमीन को केडीए के नाम दर्ज कर उन्हें कागजों में बेदखल कर दिया गया, जबकि वास्तविक कब्जा आज भी किसानों के पास है। किसानों ने दावा किया कि जिन लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, उन्हें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली, लेकिन गरीब किसान कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सके। अब दोबारा पुरानी अधिग्रहण प्रक्रिया के आधार पर जमीन कब्जाने की कोशिश की जा रही है, जो पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।
किसानों ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून का हवाला देते हुए कहा कि यदि अधिग्रहित जमीन पर वर्षों तक कोई विकास कार्य नहीं हुआ और भौतिक कब्जा नहीं लिया गया, तो जमीन वापस किसानों को मिलनी चाहिए। किसानों का आरोप है कि केडीए अधिकारी इस कानून पर चुप्पी साधे रहे और मौके पर कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। किसानों ने यह भी कहा कि “30 साल पहले पांच लाख रुपये बीघा का जो मूल्य तय किया गया था, वह आज के समय में मजाक बन चुका है। मौजूदा सर्किल रेट और बाजार मूल्य के अनुसार मुआवजा दिए बिना जमीन नहीं दी जाएगी।”
मौके पर किसान यूनियन के पदाधिकारी अरविन्द राजपूत, पीयूष शुक्ला, अजीत शर्मा, अनूप शर्मा समेत कई किसान नेताओं ने पुलिस आयुक्त से मुलाकात कर पूरे मामले की शिकायत की। किसानों के मुताबिक पुलिस आयुक्त ने मामले को उच्च स्तर पर रखने और कानून व्यवस्था के दायरे में ही कार्रवाई होने का भरोसा दिया। हालांकि किसानों का आरोप है कि केडीए विभाग व जिम्मेदार अधिकारियों ने उनकी मांगों और सवालों पर लगातार चुप्पी साधे हुए है। देर शाम तक आंधी और खराब मौसम के बावजूद किसान अपनी जमीनों पर डटे रहे। जैसे ही प्रशासनिक अमला वापस लौटा, तब जाकर किसान भी अपने घरों को लौटे। किसानों ने साफ कहा कि यदि गरीब किसानों की जमीनों पर जबरन कब्जे की कोशिश बंद नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में बड़ा जनआंदोलन खड़ा किया जाएगा।
[13/05, 20:53] Amit Patel News: *“न्यू कानपुर सिटी” पर फिर भड़का किसान गुस्सा,केडीए पर गरीब किसानों की जमीन हड़पने का आरोप, पुलिस छावनी में तब्दील हुआ इलाका*
*आंधी-तूफान के बीच खेतों पर डटे रहे किसान, बोले “यह जमीन नहीं, हमारे अस्तित्व की लड़ाई”*
कानपुर के बिठूर क्षेत्र में बुधवार को उस समय हालात तनावपूर्ण हो गए, जब कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) की “न्यू कानपुर सिटी” परियोजना के तहत किसानों की जमीन पर कब्जे की कार्रवाई की आशंका को लेकर सैकड़ों किसान खेतों पर उतर आए। भारी पुलिस बल, पीएसी और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील नजर आया। किसानों ने केडीए अधिकारियों का घेराव कर जमीन अधिग्रहण से जुड़े कानूनी दस्तावेज और मुआवजे का हिसाब मांगा, लेकिन मौके पर मौजूद अधिकारी किसानों के सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं दे सके। इससे किसानों में भारी आक्रोश फैल गया। महिलाओं समेत बड़ी संख्या में किसान खेतों पर डटे रहे और चेतावनी दी कि “जमीन पर जबरन कब्जा किसी कीमत पर नहीं होने दिया जाएगा।”पीड़ित किसानों का आरोप है कि वर्ष 1996 में धारा 17 लगाकर उनकी जमीन अधिग्रहित दिखा दी गई, जबकि न तो उन्हें उचित मुआवजा मिला और न ही कोई वैधानिक सूचना दी गई। किसानों का कहना है कि 2007 में राजस्व अभिलेखों में उनकी जमीन को केडीए के नाम दर्ज कर उन्हें कागजों में बेदखल कर दिया गया, जबकि वास्तविक कब्जा आज भी किसानों के पास है। किसानों ने दावा किया कि जिन लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, उन्हें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली, लेकिन गरीब किसान कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सके। अब दोबारा पुरानी अधिग्रहण प्रक्रिया के आधार पर जमीन कब्जाने की कोशिश की जा रही है, जो पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।
किसानों ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून का हवाला देते हुए कहा कि यदि अधिग्रहित जमीन पर वर्षों तक कोई विकास कार्य नहीं हुआ और भौतिक कब्जा नहीं लिया गया, तो जमीन वापस किसानों को मिलनी चाहिए। किसानों का आरोप है कि केडीए अधिकारी इस कानून पर चुप्पी साधे रहे और मौके पर कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। किसानों ने यह भी कहा कि “30 साल पहले पांच लाख रुपये बीघा का जो मूल्य तय किया गया था, वह आज के समय में मजाक बन चुका है। मौजूदा सर्किल रेट और बाजार मूल्य के अनुसार मुआवजा दिए बिना जमीन नहीं दी जाएगी।”
मौके पर किसान यूनियन के पदाधिकारी अरविन्द राजपूत, पीयूष शुक्ला, अजीत शर्मा, अनूप शर्मा समेत कई किसान नेताओं ने पुलिस आयुक्त से मुलाकात कर पूरे मामले की शिकायत की। किसानों के मुताबिक पुलिस आयुक्त ने मामले को उच्च स्तर पर रखने और कानून व्यवस्था के दायरे में ही कार्रवाई होने का भरोसा दिया। हालांकि किसानों का आरोप है कि केडीए विभाग व जिम्मेदार अधिकारियों ने उनकी मांगों और सवालों पर लगातार चुप्पी साधे हुए है। देर शाम तक आंधी और खराब मौसम के बावजूद किसान अपनी जमीनों पर डटे रहे। जैसे ही प्रशासनिक अमला वापस लौटा, तब जाकर किसान भी अपने घरों को लौटे। किसानों ने साफ कहा कि यदि गरीब किसानों की जमीनों पर जबरन कब्जे की कोशिश बंद नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में बड़ा जनआंदोलन खड़ा किया जाएगा।




