## 🚨 *SDM ने आम जनता की फरियाद सुनने से किया साफ इनकार, ऑडियो वायरल*
*डिस्ट्रिक हेड राहुल द्विवेदी*
**कानपुर/फतेहपुर:**
शासन-प्रशासन के बड़े दावों और ‘जनसुनवाई’ की जमीनी हकीकत को बयां करता एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एक पीड़ित जब अपनी जमीन से जुड़े मामले को लेकर स्थानीय अधिकारियों के चक्कर काटकर थक गया, तो उसने सीधे उपजिलाधिकारी (SDM) से गुहार लगाई। लेकिन मदद मिलना तो दूर, प्रशासनिक कुर्सी पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि वे इस मामले में कुछ नहीं कर सकते।
पीड़ित और अधिकारी के बीच हुई बातचीत का एक कथित ऑडियो **”AUD-20260531-WA0005.aac”** अब सामने आया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में खलबली मचा दी है।
### 📞 ऑडियो में क्या है? (अधिकारी की बेरुखी और तल्ख तेवर)
सामने आए ऑडियो में पीड़ित अपनी बेबसी बयां कर रहा है, लेकिन अधिकारी का रवैया बेहद सख्त और संवेदनहीन दिखाई दे रहा है:
* **10 से 12 का ही टाइम:** पीड़ित जब शिकायत लेकर पहुंचा, तो अधिकारी ने साफ कहा कि चाहे तुम १०० घंटे खड़े रहो, मिलने का समय सिर्फ १० से १२ बजे का है। आवास पर मिलने का कोई प्रावधान नहीं है।
* **”कोर्ट के अलावा मैं हस्तक्षेप नहीं करूँगा”:** भूमिधरी और राजस्व से जुड़े इस मामले पर जब पीड़ित ने स्थानीय पुलिस और लेखपाल से मदद न मिलने की बात कही, तो अधिकारी ने सीधे पल्ला झाड़ते हुए कहा, *”कोर्ट के अलावा उसमें मैं हस्तक्षेप नहीं करूँगा। आप बना पाइए आप बना लीजिए, वो दूसरा आदमी बना पाए वो बना ले। माननीय उच्च न्यायालय के ऊपर न मैं हूँ, न कोई है।”*
* **”आवास पर किसी से नहीं मिलूँगा”:** जब पीड़ित ने अपनी मजबूरी बताई, तो अधिकारी ने दो टूक कहा कि चाहे कोई भी आ जाए, वे सरकारी समय के अलावा अपने आवास पर किसी से नहीं मिलेंगे और न ही किसी का काम रुकवाने या बनवाने जाएंगे।
### 🧐 बड़ा सवाल: आखिर कहाँ जाए गरीब आदमी?
इस पूरे मामले ने स्थानीय स्तर पर कानून-व्यवस्था और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब पीड़ित ने यह कहा कि जांच के लिए सतीश महाना जी ने भी बोला था, उसके बावजूद लेखपाल, स्थानीय पुलिस और SDM स्तर से साफ मना कर दिया गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि अगर सूबे की पुलिस, लेखपाल और खुद SDM ही आम जनता की जायज़ समस्याओं को सुनने और उनका निस्तारण करने से इस तरह साफ मना कर देंगे, तो एक गरीब और लाचार आदमी इंसाफ की गुहार लेकर आखिर किसके दरवाजे पर जाए? क्या डिजिटल इंडिया और त्वरित न्याय के दावों के बीच जमीनी स्तर पर जनता को सिर्फ तारीखें और बेरुखी ही मिलेगी?
इस वायरल ऑडियो के सामने आने के बाद अब देखना यह होगा कि क्या शासन स्तर पर इस संवेदनहीनता का संज्ञान लिया जाता है या पीड़ित इसी तरह न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर रहेगा।




