श्रीमती पल्लवी मुखर्जी
जन्म: 26 नवम्बर
जन्म स्थान: रामानुजगंज, सरगुजा (छत्तीसगढ़)
शिक्षा:
स्नातक, संगीत विशारद
रचनात्मक सक्रियता:
आपकी कविताएँ एवं लेख देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
बिजुका ब्लॉग, लिट्रेचर पॉइंट, गूंज, हिंदीनामा, साहित्यधारा अकादमी, लेखनी, समकालीन परिदृश्य, पोषम पा, उत्कृष्ट पत्रिका, छत्तीसगढ़ आस-पास, बहुमत, दुनिया इन दिनों, जनसंदेश टाइम्स, पाखी, अनुगूंज, कविकुंभ, वागर्थ, दोआबा, आजकल, ककसाड़, माटी, क्लिक, हस्तांक, रेवांत आदि।
अब तक दस साझा कविता संकलनों में आपकी रचनाएँ सम्मिलित हो चुकी हैं।
आपकी कुछ कविताओं का अंग्रेज़ी एवं बांग्ला भाषा में अनुवाद भी किया गया है।
प्रकाशित कृति:
विलुप्त हो जाती हैं स्त्रियाँ (पहला कविता संग्रह)
पता:
मकान क्रमांक 88
जे.पी. विहार, मंगला
बिलासपुर, छत्तीसगढ़ – 495001
संपर्क:
📞 9131139652
*गौरैया*
*पल्लवी मुखर्जी*
तुम प्रेम में हो
या तुम
प्रेम करते हो
या फिर
सीखते हो प्रेम—
जैसे
सीखता है एक जुलाहा
करघे पर कपड़ा बुनना,
या
सीखता है कुम्हार
चाक पर घड़ा बनाना,
जबकि उसकी दृष्टि
टिकी रहती है
चाक की धुरी पर।
पर
गौरैया की आँखों में देखो—
प्रेम से लबालब भरी
वे आँखें
तुम्हें
छलकती हुई मिलेंगी।
उसके पास है
वह ऊष्मा,
जितनी चाहिए
प्रेम के लिए।
गौरैया
प्रेम की तलाश में
पूरा जंगल नहीं नापती।
वह तो
बस ठहर जाती है—
और प्रेम
किसी नन्हे छौने की तरह
चलकर
उसके पास आ जाता है।
और तुम?
तुम जगा देते हो
उसे भी
जो प्रेम की गहरी नींद में है,
जिसकी मुंदी पलकों में
अब भी कैद है
गौरैया का प्रेम—
होंठों पर प्यास
और
जंगल का हरियाता संगीत।
इन दिनों
गौरैया
किसी दूर देश में नहीं,
हमारे ही आसपास
गुम होने के कगार पर है।
प्रेम का हो रहा है बलात्कार—
जैसे
जंगल में
पेड़ कट रहे हों
धड़ाधड़!




