सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद गेस्ट फैकल्टी पर नया संकट!
पुराने शिक्षकों को हटाकर नए गेस्ट फैकल्टी की भर्ती पर उठे सवाल, ‘मनीष गुप्ता बनाम जन भागीदारी समिति’ फैसले की हो रही अनदेखी? विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी पर भी सवाल
लखनऊ। डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में गेस्ट फैकल्टी की भर्ती को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले तक पहुंच गया है। विश्वविद्यालय में वर्षों से कार्यरत गेस्ट फैकल्टी शिक्षकों को सेवा विस्तार दिए बिना नए गेस्ट फैकल्टी की चयन प्रक्रिया शुरू किए जाने के मामले में शिकायतकर्ता ने 21 अप्रैल 2022 के सुप्रीम कोर्ट के ‘Manish Gupta & Anr. बनाम President, Jan Bhagidari Samiti & Ors.’ फैसले का हवाला देते हुए गंभीर सवाल उठाए हैं। �
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट सिद्धांत दोहराया कि किसी ad hoc कर्मचारी को दूसरे ad hoc कर्मचारी से नहीं बदला जा सकता। उसे केवल नियमित चयन प्रक्रिया के तहत नियुक्त नियमित अभ्यर्थी द्वारा ही प्रतिस्थापित किया जा सकता है। अदालत ने इसके लिए Rattan Lal बनाम State of Haryana तथा Hargurpratap Singh बनाम State of Punjab के फैसलों का भी उल्लेख किया। �
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इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित शिक्षकों को नियमित रूप से चयनित उम्मीदवारों द्वारा प्रतिस्थापित किए जाने तक अपने पदों पर काम जारी रखने का अधिकार दिया। हालांकि यह व्यवस्था संबंधित पाठ्यक्रमों में पर्याप्त संख्या में विद्यार्थियों की उपलब्धता की शर्त के अधीन रखी गई थी। �
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यानी फैसले का मूल सिद्धांत साफ है—सिर्फ एक गेस्ट/एडहॉक शिक्षक को हटाकर उसकी जगह दूसरा गेस्ट/एडहॉक शिक्षक नियुक्त करना न्यायिक कसौटी पर सवालों के घेरे में आ सकता है।
विश्वविद्यालय के मामले में क्यों उठ रहा है सवाल?
उपलब्ध शिकायत और समाचार-कटिंग के अनुसार, विश्वविद्यालय में करीब 75 गेस्ट फैकल्टी शिक्षक लंबे समय से सेवाएं दे रहे हैं, जबकि दूसरी ओर उनके सेवा विस्तार को लेकर स्थिति स्पष्ट किए बिना नए गेस्ट फैकल्टी की भर्ती के लिए विज्ञापन और चयन प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
यहीं पर सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त फैसले की प्रासंगिकता सामने आती है। Manish Gupta मामले में भी पुराने गेस्ट शिक्षकों को एक शैक्षणिक सत्र के बाद हटाकर अगले सत्र में नए विज्ञापन के जरिए फिर से नियुक्ति प्रक्रिया अपनाई जा रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को देखते हुए कहा था कि ad hoc कर्मचारी को दूसरे ad hoc कर्मचारी से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। � �
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क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भावना की हो रही अनदेखी?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि विश्वविद्यालय में पहले से कार्यरत गेस्ट फैकल्टी की आवश्यकता बनी हुई है और उनकी जगह नए गेस्ट फैकल्टी को चयन प्रक्रिया के माध्यम से लाया जा रहा है, तो क्या यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांत के अनुरूप है?
यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में संबंधित शिक्षकों को नियमित रूप से चयनित अभ्यर्थियों के आने तक जारी रखने की व्यवस्था की थी। �
हालांकि, विश्वविद्यालय की भर्ती प्रक्रिया और कार्यरत गेस्ट फैकल्टी की नियुक्ति की वास्तविक कानूनी स्थिति का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हुए बिना यह कहना अंतिम रूप से संभव नहीं है कि विश्वविद्यालय ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना की है। लेकिन उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि क्या पुराने गेस्ट फैकल्टी को हटाकर नए गेस्ट फैकल्टी की नियुक्ति की जा रही है और यदि ऐसा है तो सुप्रीम कोर्ट के उक्त निर्णय को विश्वविद्यालय ने किस आधार पर लागू नहीं किया?
विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी क्यों?
सबसे अहम बात यह है कि इस पूरे मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अब तक स्पष्ट और आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है।
प्रश्न यह है कि—
क्या विश्वविद्यालय प्रशासन Manish Gupta मामले में सुप्रीम कोर्ट के 21 अप्रैल 2022 के फैसले से अवगत है?
यदि अवगत है तो वर्तमान गेस्ट फैकल्टी भर्ती प्रक्रिया में उस फैसले के सिद्धांतों का पालन किस प्रकार किया जा रहा है?
वर्षों से कार्यरत गेस्ट फैकल्टी को सेवा विस्तार देने के बजाय नए गेस्ट फैकल्टी की भर्ती क्यों?
क्या पुराने शिक्षकों को हटाकर उनकी जगह नए गेस्ट फैकल्टी नियुक्त किए जा रहे हैं?
यदि हां, तो विश्वविद्यालय के पास ऐसा करने का कानूनी आधार क्या है?
और यदि परिस्थितियां सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अलग हैं, तो विश्वविद्यालय इसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं कर रहा?
दिव्यांग विश्वविद्यालय में मामला और भी संवेदनशील
यह मामला सामान्य भर्ती विवाद से इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि संबंधित विश्वविद्यालय का मुख्य दायित्व दिव्यांग विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना है। लंबे समय से विद्यार्थियों को पढ़ा रहे अनुभवी शिक्षकों को अचानक हटाने और उनके स्थान पर नई नियुक्तियां करने से शैक्षणिक निरंतरता पर भी असर पड़ने की आशंका है।
अब गेंद विश्वविद्यालय प्रशासन के पाले में है। उसे यह स्पष्ट करना होगा कि 21 अप्रैल 2022 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांत वर्तमान गेस्ट फैकल्टी भर्ती प्रक्रिया पर लागू होता है या नहीं और यदि नहीं, तो क्यों नहीं।
कानून की कसौटी पर भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता से अधिक महत्वपूर्ण यह सवाल बन गया है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट न्यायिक सिद्धांत का विश्वविद्यालय ने समुचित संज्ञान लिया है? फिलहाल इस सवाल पर विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी कई नए सवालों को जन्म दे रही है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद गेस्ट फैकल्टी पर नया संकट!
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