दो दिवसीय रबी दलहन वार्षिक बैठक का हुआ
शुभारंभ:दलहन अनुसंधान में उत्पादकता बढ़ाने के लिए ‘उपज बाधा’ तोड़ना होगा : डॉ. एम एल जाट
अखिल भारतीय समन्वित रबी दलहन अनुसंधान परियोजना की दो दिवसीय 31वीं वार्षिक समूह बैठक का शुभारंभ चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर में हुआ।
उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता डॉ. एम एल जाट, सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर) तथा महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा की गई।
अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. जाट ने कहा कि दलहन अनुसंधान में वर्तमान चुनौतियों की प्राथमिकता निर्धारित कर लक्ष्य आधारित कार्ययोजना बनाना आवश्यक है। किसान के लिए उत्पादन के साथ लाभप्रदता सर्वोच्च प्राथमिकता है, इसलिए अनुसंधान एवं तकनीकों का विकास किसानों की आय एवं लाभ बढ़ाने की दिशा में होना चाहिए। उन्होंने कहा कि उत्पादकता में अनिश्चितता से बाजार में भी अनिश्चितता उत्पन्न होती है, अतः उत्पादन एवं बाजार दोनों को ध्यान में रखते हुए तकनीकों का विकास जरूरी है। डॉ जाट ने दलहन फसलों की उत्पादकता में आ रही बाधाओं को दूर करते हुए ‘उपज बाधा’ को तोड़ने तथा स्पष्ट उत्पादकता लक्ष्य निर्धारित करने पर जोर दिया।
जैविक एवं अजैविक तनावों के प्रभाव को कम करने के लिए जलवायु अनुकूल एवं तनाव सहनशील तकनीकों के विकास की आवश्यकता बताई।डॉ. जाट ने कहा कि दलहनी फसलों में फास्फोरस एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व है, जिसके समुचित एवं संतुलित प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए उन्नत प्रबंधन तकनीकों को अपनाने पर बल दिया।उन्होंने कहा कि अनुसंधान से विकसित सर्वोत्तम कृषि पद्धतियों का व्यापक स्तर पर किसानों तक पहुंचना और उनका प्रभावी अंगीकरण सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके लिए सुदृढ़ एवं विश्वसनीय बीज प्रणाली विकसित करना भी आवश्यक है, ताकि गुणवत्तायुक्त बीज किसानों को समय पर उपलब्ध हो सके।इस अवसर पर उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ डी के यादव द्वारा कहा गया कि उपलब्ध नवीन प्रजातियां एवं सफल तकनीक का दलहनी फसलों में समावेश कर दलहन का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
सहायक महानिदेशक (तिलहन एवं दलहन) डॉ एस के झा द्वारा बताया गया कि दलहन के कुल उत्पादन में 60% की भागीदारी रबी दलहनी फसलों की है। दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करती हैं।
भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ जी पी दीक्षित द्वारा बताया गया कि वैज्ञानिकों एवं किसानों के बीच में तकनीकी की खाई को पूरा करने के लिए प्रथम पंक्ति प्रदर्शन के माध्यम से किसानों में जागरूकता की जा रही है तथा कम लागत तकनीक जैसे जैविक उर्वरकों का प्रोत्साहित किया जा रहा है।विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ संजीव गुप्ता द्वारा बताया गया कि दलहन उत्पादन में विश्वविद्यालय की सार्थक भूमिका रही है तथा देश में उकठा रोग के प्रति रोगरोधी प्रजाति का विकास सर्वप्रथम इस विश्वविद्यालय द्वारा किया गया है। उन्होंने कहा कि दलहन में आत्मनिर्भरता के लिए भारत सरकार द्वारा भरपूर बजट का आवंटन किया गया है। परियोजना समन्वयक डॉ शैलेश त्रिपाठी द्वारा गत वर्ष की उपलब्धियां का प्रस्तुतीकरण करते हुए बताया कि परियोजना के अंतर्गत बायो फोर्टीफाइड एवं मशीन से कटाई करने वाली प्रजातियों को प्रचार प्रसार किया जा रहा है। कार्यक्रम में सहायक महानिदेशक (बीज )डॉ बी आर चौधरी, कृषि आयुक्त डॉ पी के सिंह, डॉ मसूद अली आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का आयोजन चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय एवं भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान द्वारा संयुक्त रूप से किया गया जिसमें विभिन्न प्रदेशों से लगभग 100 दलहन वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिभाग किया। उद्घाटन समारोह के पश्चात डॉ एम एल जाट द्वारा मृदा विज्ञान विभाग में स्थापित पेस्टीसाइड प्रयोगशाला का भ्रमण करते हुए प्रयोगशाला के रखरखाव एवं कार्य की प्रशंसा की गई।




